Wednesday, March 23, 2011

लागी लगन को लगने दे . . .


कविता - 1

लागी लगन को लगने दे . . .
लागीे लगन को लगने दे , रति भर भी इसे न गिरने दे।
लागी लगन को लगने दे।

न हो फीका, बन ध्रुव के सरीखा, सुख दुःख की नाव चलने दे।
मुसीबत को मुश्किल हो जायेगी, तू मन को मत मचलने दे।।
जो प्रभु का हो सो रह जाये, जो तेरा हो सो जलने दे।
लागी लगन को लगने दे। लागी लगन को लगने दे।


ना सरका इस संसार में, मन को तू संभलने दे।
जरूरी हो वो ही कर, व्यर्थ के काज को टलने दे।
तड़प जगा दे तीव्र तू, नहीं जोश को ढ़लने दे।
लागी लगन को लगने दे। लागी लगन को लगने दे।

मुक्त हो जा पाले मंजिल, औंरो को मंचलने दे।
पानी की पूड़िया है संसार, इसको तू गलने दे।।
बदला बदली को खेल है भैया, दुनियां को बदलने दे।।
लागी लगन को लगने दे। लागी लगन को लगने दे।

- 18.07.2007


कविता - 2

किया तो क्या किया ?

माया बनायी मोह किया, काया के पिंजरे में जकड़ा गया।
नर जन्म पाकर भी नर तूने, काम न कोई तगड़ा किया।
तेरा मेरा करता रहा, नश्वर के लिए ही झगड़ा किया।
किया तो क्या किया ? किया तो क्या किया ?

न किया सद्गुरू तूने, तू निगुरा होकर जिया।
हो भी गया सुगरा तो, ना ही कभी जाप किया।।
जो तेरे नहीं थे जल गये, उनके लिए संताप किया।
किया तो क्या किया ?  किया तो क्या किया ?

छल कपट बेईमानी से, धन ढ़ेरो भेगा किया।
दबा कर बैठ गया सारा, कभी न तूने दान दिया।
गाता रहा मेरे तेरे की गजलें, कभी ना हरि गुणगान किया।
किया तो क्या किया ? किया तो क्या किया ?

क्या सोच रहा तू , अब सद्गुरू बिन नहीं जाये जिया।
वो साथ जायेगे, सब छुट जायेगा जो यहां किया।।
परदें की परतें हटा जरा, उस पार है तेरे पिया।
किया तो क्या किया ?  किया तो क्या किया ?
- 18.07.2007


कविता - 3

सबको एक दिन मरना होगा

मर गया मर गया क्या बोले तू, सबको एक दिन मरना होगा।
मिला मानव जन्म मुझको, महाकाज मुझको करना होगा।
मुसीबतों के महासागर से, अब नहीं मुझकों डरना होगा।
संसार सरकता जायेगा, सबको एक दिन मरना होगा।।

मैला हो या मटमेला तू, अब नही तुझको संवरना होगा।
गले लगालो पिया मुझको, इजहार तुझको करना होगा।।
दुनियां है मुसाफिर खाना, इसका किराया भरना होगा।।
संसार सरकता जायेगा, सबको एक दिन मरना होगा।।

शरीर क्या  तेरा ? दो खड़ी दो हड्ड्यिां आड़ी।
रग रग में मल भरा है, समझले  अनाड़ी।।
आ जायेगी जरा अवस्था, तेरे बालों को झड़ना होगा।
संसार सरकता जायेगा, सबको एक दिन मरना होगा।।

मम्मी पापा चाचा चाची, कौन ताउ कौन तायी रे।
बहन बुआ दादा दादी कौन भतीजा कौन भाई रे।।
कौन तेरे संगी साथी, सबसे एक दिन बिछड़ना होगा।
संसार सरकता जायेगा, सबको एक दिन मरना होगा।।
- 18.07.2007


कविता - 4

औंर तीरथ क्या जाना गुरूवर, जब तेरी छावं में आ गये ।

अब डर नहीं हमको, निड़र होकर जिया करेगें।
तेरी पीयूष वाणी का पान, हम नित्य किया करेगें।।
क्यों करे दीदार दुनियां का, बस आप ही भा गये।।
औंर तीरथ क्या जाना गुरूवर, जब तेरी छावं में आ गये।

दुनियां के लोगो के, अजीबोगरीब धन्धे हैं।
स्वीकार करो हमें प्रभू, हम जैसे है तेरे बन्दे हैं।
सदा करो साधसंगति, सारे शास्त्र ये समझा गये।
औंर तीरथ क्या जाना गुरूवर, जब तेरी छावं में आ गये।

लोग कहे  बावरा, पढ़ाई में कमजोर रे।
अब तो गुरूवर आपके हवाले, ये जीवन की ड़ोर रे।।
हटा दो मेरे मालिक विकार के बादल, जो मुझपे छा गये।
औंर तीरथ क्या जाना गुरूवर, जब तेरी छावं में आ गये।
 - 18.07.2007







कविता - 5

जब तेरी सूरत का प्याला पिया तो ठिकाना न रहा।

भटक गये भवसागर में, अब न कोई ठिकाना रहा।
आपसे क्या छुपाये गुरूवर, अब न कोई बहाना रहा।।

बोतल में उतारा था लोगो को, झुठ कपट औंर जाल से।
अब लग रहा डर खुद  को, मौत के महाकाल से।।
दुनियां ने ठुकरा दिया, अब न कोई ठिकाना रहा।
आपसे क्या छुपाये गुरूवर, अब न कोई बहाना रहा।।

अनुकूलता में हुआ राजी, हज जाकर बन गया हाजी।
तीरथ नहाये लाख मगर, फिर न हुए प्रभू राजी।।
अपने ही कहते है मुझे, बुढ़े तेरा न जमाना रहा।
आपसे क्या छुपाये गुरूवर, अब न कोई बहाना रहा।।

सोच लिया था मैंने प्रभू, अब मेरा जमाना न रहा।
मगर
जब तेरी सूरत का प्याला पिया तो ठिकाना न रहा।
18.07.2007

कविता - 6 ( भजन )

ऐसी लगन लगा दो गुरूवर!

ऐसी लगन लगा दो गुरूवर, ज्ञान तुम्हारा पाये हम।
न भागे भोगो के पीछे,  तुमको नहीं भुलाये हम।।

मेवाड़ की मींरा ने, तुमको पति बनाया था।
छोटे से ध्रुव लाल ने, तुमको ही तो ध्याया था।।
आ जाओ मेरे दिलबर, दिल मे तुम्हे बिठाये हम।
न भागे भोगो के पीछे, तुमको नहीं भुलाये हम।।

त्रेता युग में तुलसीदास ने, तेरा ही गुण गाया था।
नामदेव ने तेरे नाम का, एक तारा बजाया था।
आ जाओ मेरे गुरूवर, तुमसे दिल लगाये हम।
न भागे भोगो के पीछे, तुमको नहीं भुलाये हम।।

तुम ही बने थे राम रमैया, तुम ही राधा श्याम जी।
कलयुग में तुम बनकर आये, सद्गुरू आसाराम जी।।
अब निहारे तेरे नजारे, तुझसे नजर मिलाये हम।
न भागे भोगो के पीछे, तुमको नहीं भुलाये हम।।

तुम संग खेले होली दीवाली, दशहरा मनाये हम।
दूर हटाये फीेके रंग को, तेरा रंग लगाये हम।
दास  शरम न राखे, तुझमें ही खो जाये हम।।
न भागे भोगो के पीछे, तुमको नहीं भुलाये हम।।
- जाग

कविता - 7

जाग जाग जाग भैया, अब अवसर आया।

शरीर मेरे वश में नहीं, नही यहां की माया।
हे सम्पत तू सम्पत नहीं, ये नही है तेरी काया।।
मन चाहा खाना खाया, पर परमात्मा ने पचाया।
जाग जाग जाग भैया, अब अवसर आया।

कितनी बार पड़ा भोगो में, उसने तुझे बचाया।।
नहीं हुआ मन निर्मल तेरा, लाख तीरथ नहाया।
बता प्यारें क्यों नहीं तुने, हरि से नेह लगाया।।
जाग जाग जाग भैया, अब अवसर आया।

सारी उमर किया मेरा, धन खूब कमाया।
जिसने दिया धन तुझको, उसको समझ नहीं पाया।
मेरे तेरे के मोह में, खुद को अब उलझाया।
जाग जाग जाग भैया, अब अवसर आया।

कुछ औंर नही मिला भैया, सिर्फ धोखा पाया।
बोतल में ड़ाला लोगो को, कपट जाल बिछाया।
खुद भी रोया दुःख आने पर ,औंरो को रूलाया।।
जाग जाग जाग भैया, अब अवसर आया।



जहां लगाना था समय, वहां नही लगाया।
करना था गुरू गुणगान, तुने भजन न कोई गाया।
जा सके जो साथ तेरे, ऐसा धन ना कमाया।
जाग जाग जाग भैया, अब अवसर आया।

नश्वर है सारा जहां, औंर नश्वर तेरी काया।
शाश्वत धन कमाकर , मुक्त हो जा भाया।
जाग जाग जाग भैया, अब अवसर आया।









कविता - 8

हंसी आ रही है खुद पे, राज समझ में आ गया।

अब कुछ भी पुकारों नाम मेरा, मुझे कोई अफसोस नहीं।
बन गया है काम मेरा, कि आत्मा में कोई दोष नहीं।।
पहले था पगलाया, अब पागल हो गया हूॅ।
गुरू ज्ञान की गंगा नहाकर, गुमनाम मैं हो गया हॅू।
कहीं न जाउं, कुछ न देखूं, गुरू नशा मुझपे छा गया।
हंसी आ रही है खुद पे, राज समझ में आ गया।

चोर आया आश्यिाने पर, जरूरत की वस्तु ले गया।
पहले हुआ था दुःखी, कि दुःख मुझको दे गया।।
फिर पता चला मुझको, क्या था मेरा जो वो ले गया।
नादान होकर जी रहा था, बिन भजन भोजन खा गया।
हंसी आ रही है खुद पे, राज समझ में आ गया।

मुझमें कोई थकान नहीं, जहां रहता हूॅ मेरा मकान नहीं।
सब घर मरघट है , अलग से कोई श्मशान नहीं।।
गुरू दरबार में थोक का धन्धा, ये फुटकर दुकान नहीं।
दर्द था दुनियां का, अब फाकी फकीरी की खा गया।
हंसी आ रही है खुद पे, राज समझ में आ गया।

- 19.07.2007



कविता - 9

ऐसी नजर दे दो गुरूवर, कुछ औंर नजर न आये।

जिनको मैंने समझा अपना, वो निकल गये पराये।
मेरे मेरे के चक्कर में, बहुत वैरी बनाये।।
उब गया हूॅ मेरे गुरूवर, राह समझ न आये।
ऐसी नजर दे दो गुरूवर, कुछ औंर नजर न आये।।

सारे जहां को जाना तो, बहुत बाकी रह गया।
भगवान का प्यारा कबिरा, एक साखी कह गया।।
क्या खाया क्या कमाया, सबको जाना है जो आये।
ऐसी नजर दे दो गुरूवर, कुछ औंर नजर न आये।।

साधन क्या संसार के, सब ईश्वर की माया हैं।
रिस्ते क्या है प्यार के, नश्वर तेरी काया हैं।
जग झंझाल झुठा है , क्यों समझ न आये।
ऐसी नजर दे दो गुरूवर, कुछ औंर नजर न आये।।

सब जहर बन गये, हे मानव तेरे खाते ही।
अनामी था साधक तू, नाम रखा आते ही।
मांग सके तो मांग मनवा, ये अवसर न आये।
ऐसी नजर दे दो गुरूवर, कुछ औंर नजर न आये।।
 - 18.07.2007


कविता - 10 ( लोक संगीत  राजस्थानी में मेवाड़ी भाषा में)

 सांची कोने कीदीं ये सद्गुरू सूं प्रीत।

उमर गई बीत, न गया प्रभु गीत, सांची कोने कीदीं ये सद्गुरू सूं प्रीत।
सद्गुरू सूं प्रीत, मारा सावरियां सू प्रीत, दौड़ी दौड़ी आ जा ये गाले प्रभु गीत।
ओ मन घंणो भट्कावें, ई लूली ने भट्का आवें।
मारा सद्गुरू जी आवे, वे माने यूं समझावें।
ओ मन ही थारो मीत, थूं गाले प्रभू गीत।
साची कोने कीदीं ये सद्गुरू सूं प्रीत।

उमर गई बीत, न गया प्रभु गीत, , साची कोने कीदीं ये सद्गुरू सूं प्रीत।
सद्गुरू सूं प्रीत, मारा सावरियां सू प्रीत, दौड़ी दौड़ी आ जा ये गाले प्रभु गीत।
आ चौरासी की चक्करी, ओ चौरासी को खेल।
थूं काई मन में राखे ये, झुठ कपट को मेल।
इ मनवा ने थू जीत, थूं गाले प्रभु गीत।।
साची कोने कीदीं ये सद्गुरू सूं प्रीत।

उमर गई बीत, न गया प्रभु गीत, साची कोने कीदीं ये सद्गुरू सूं प्रीत।
सद्गुरू सूं प्रीत, मारा सावरियां सू प्रीत, दौड़ी दौड़ी आ जा ये गाले प्रभु गीत।
चाली चारों धाम, चाली मथुरा काशी।
तू बाहर काई खोजे ये, घट भीतर अविनाशी।
म्हारा सद्गुरू जी बतावे, रब पाबा री रीत।
साची कोने कीदीं ये सद्गुरू सूं प्रीत।


उमर गई बीत, न गया प्रभु गीत, साची कोने कीदीं ये सद्गुरू सूं प्रीत।
सद्गुरू सूं प्रीत, मारा सावरियां सू प्रीत, दौड़ी दौड़ी आ जा ये गाले प्रभु गीत।
 ओ घर थारो कोनीं, ओ पिया रो देश।
कां करे लड़ाया थूं , कां करे क्लेश।
गाले समता बावरी, गुरूभगति रा गीत।
साचीं कर ल  सखि थूं, सद्गुरू सूं प्रीत।

उमर गई बीत, न गया प्रभु गीत, साची कोने कीदीं ये सद्गुरू सूं प्रीत।
सद्गुरू सूं प्रीत, मारा सावरियां सू प्रीत, दौड़ी दौड़ी आ जा ये गाले प्रभु गीत।










कविता - 11 ( लोक संगीत )

जरा सी जिंदगी साथी, क्यों बात करे खोटी रे।

जरा सी जिंदगी साथी, क्यों बात करे खोटी रे।
करले भाया राम भजन तू, उमर घणी छोटी रे।।
जरा सी जिंदगी साथी, क्यों बात करे खोटी रे।
इ लूली का कारणे, गाल्या काढ़े खोटी रे।
फुटी कोड़ी लारे न चाले, न चाले लंगोटी रे।
जरा सी जिंदगी साथी, क्यों बात करे खोटी रे।
करले भाया हरि भजन तू, उमर घणी छोटी रे।।
जरा सी जिंदगी साथी, क्यों बात करे खोटी रे।
खूब बणाया मेल र माल्या, जीन्स का पेर्या पेन्ट रे।
मरता ही थारे द्वारे, लाग्या बेसक का टेन्ट रे।
जरा सी जिंदगी साथी, क्यों बात करे खोटी रे।
खूब बणायां चेहरा सुन्दर, वा फुन्दा री चोटी रे।
जरा सी जिंदगी साथी, क्यों बात करे खोटी रे।
करले भाया राम भजन तू, उमर घणी छोटी रे।।
 खूब खाया पुवा पकौड़ी, पर खाणीं पड़ी रोटी रे।
रोट्या खाकर मोटो हेग्यो, अरे बुद्धि कर दी छोटी रे।
जरा सी जिंदगी साथी, क्यों बात करे खोटी रे।
करले भाया राम भजन तू, उमर घणी छोटी रे।।


कविता - 12

अब धीरज का सागर टूट रहा है, प्रभु देर काहे लगाते हो।

सब को भव से तार दिया है, फिर हमें काहे भूलाते हो ?
हम नादान न जाने पूजा, मगर बापू बिन नहीं कोई दूजा।
कौनसी खफा हुई थी हमसे, जो दूर आप जाते हो।
सब को भव से तार दिया है, फिर हमें काहे भूलाते हो ?

लगी लगन को लगने दो अब काहे बुझाते हो।
बापू रूप में आप आकर, नित सत्संग रोज सुनाते हो।
जब सोता हॅू मैं निद्रा में, सपने मे तुम ही आते हो।
सब को भव से तार दिया है, फिर हमें काहे भूलाते हो ?

अगर माना मैं सो गया, तो आप ही जगाते हो।
हम थे गिरे हुए भव में, जब आप ही उठाते हो।
पुकार सुनकर सम्पत की, क्यों नही ं फिर आते हो।
सब को भव से तार दिया है, फिर हमें काहे भूलाते हो ?

आवाज आयी कहां बाहर ढूढ़े भाई।
मैं तो तेरे भीतर था, बैठा था मन माही।
भूल हुई है मुझसे स्वामी, आप दूर कभी भी नहीं जाते हो।
अब छोड़ा मैंने जग झझांल, आपही रिस्ते नाते हो।
हो जाता जब जीवन में अधेंरा, आप ही उजाला लाते हो।
औंर सबको भव पार लगाते हो। - 20.07.2007
कविता - 13
मौज ही मौज हैं।
ना कोई लापता ना किसी की खोज हैं।
 मौज ही मौज है।
पहचानता था जिनको, उनकी पहचान मिट गयी।
जानता था जिनको उनकी जान मिट गयी।
फिर क्या ?
अब रूतबा मेरे जोगी का, हर रोज हैं।
ना कोई लापता ना किसी की खोज हैं।
मौज ही मौज है।
जरा आप ही बता दो ,
राग करूं तो किससे ?
द्वेष करूं तो किससे ?
ये तो सारे शब्द है।
अच्छे बुरे जो भी है,ये शब्दों की फौज हैं।
ना कोई लापता ना किसी की खोज हैं।
मौज ही मौज है।
मेरा वजूद क्या है ?
दुनियां के गलियारे में
क्या रखा है रिस्तों के
इस भाईचारें में
सब कुछ  तेरी साधना में
भारी भारी बोझ हैं।
ना कोई लापता ना किसी की खोज हैं।
 मौज ही मौज हैं।
कविता - 14

तुम्हे क्यों बताउं, कि मुझको किससे प्यार हुआ ?

कहीें मिली सुगंध मुझे, तो कहीं गंध से पसार हुआ।
जब से मिली बापू की महक, तब से सपना संसार हुआ।।
जो भी आया जोगी के दर पर, उसका बेड़ा पार हुआ।
रह गये देखते दुनियां वाले, मेरा तो उद्धार हुआ।।
तुम्हे क्यों बताउं, कि मुझको किससे प्यार हुआ ?

बेवफाई नहीं जानता, वो ऐसा मेरा प्यारा हैं।
जग वालों के प्यार से, जोगी का प्यार न्यारा है।
मिल कर करते है हम बातें।
बित जाती है रंगीन रातें।
अरे! दूरी ही नहीं है हमारे प्यारे में
तो किससे करें मुलाकातें ?
जग का वो जगपाल हैं।
सदा रहता साथ मेरे।
नहीं करता मैं जगरातें।
अब बता ही देता हूॅ कि किससे मुझको प्यार हुआ।
सुनो साधो! जब से मुझे बापू का दीदार हुआ।
तो अपना काम बन गया। औंर बापू से ही प्यार हुआ।।

- उन्ही का
कविता - 15

रक्षा बंधन में भी बंधन हैं।

मैं तो निकला मुक्ति की राह पर, क्या त्यौंहार रक्षाबंधन हैं ?
मैं नही मनाता जग वालों का साथ, क्यों की रक्षा बंधन में भी बधंन हैं।
जब मैं ही खुद उजाला हूॅ,  तो मुझे दीवाली से क्या ?
जब मैं ही कमल हूॅ,  तो मुझे माली से क्या ?
उन्ही के साथ रिस्ता मेरा उन्ही को वन्दन हैं।
मैं नही मनाता जग वालों का साथ, क्यों की रक्षा बंधन में भी बधंन हैं।

रूठे जमाना रूठने दे, मैं तो रब को ही मनाता हूॅ।
रंग हर होली का, सद्गुरू से ही लगवाता हूॅ।।
आप भी आओं मेरे गुरू के दर पे, आपका अभिनन्दन हैं।
मैं नही मनाता जग वालों का साथ, क्यों की रक्षा बंधन में भी बधंन हैं।

बाल हुये सफेद मेरे, ये सात्विक रंग हैं।
ये करना, वो करना ये तो जिंदगी की जंग हैं।
सुनता रहूं मैं शंखनाद सद्गुरू की, वो ही sab के नन्दन हैं।
मैं नही मनाता जग वालों का साथ, क्यों की रक्षा बंधन में भी बधंन हैं।


- शरणार्थी

कविता - 16

अब गुलाम हो गया हॅू।

कर्म करता था मन माने, सोचता था दुनियां जाने।
उतार देता था लोगो को बोतल में ,करके ताने बाने।।
नाम था kuch मेरा, अब बेनाम हो गया हॅू।
नहीं जरूरत है आजादी की,
जब से जोगी का गुलाम हो गया हॅू।

कविता - 17

अगर चोट न खाता जमाने की
अगर चोट न खाता जमाने की, तो तेरी चौखट पर आता कैसे ?
न तोड़ते जग वाले रिस्ता, तो रिस्ता तुझसे बनाता कैसे ?
कुरबान जाउं दुनियां के दर्द पर, महरबानी मुशकिलों की।
वरना मैं तीव्रइच्छा से तुझको बुलाता कैसे ?

 कविता - 18

आये थे सपने में मेरे सांई
कर्जा है उनका भी, जो मुझे गुरू दर पे छोड़ गये।
मैं था मंझाधर में, मेरा रिस्ता गुरू से जोड़ गये।।
आये थे सपने में मेरे सांई, मेरा भ्रम सारा तोड़ गये।
भटक रहा था भवसागर में, वे किनारे पे मुझको छोड़ गये।।


कविता - 19

मारो सद्गुरू सांवरियो, sadhak पर जादू कर ग्यो।

मारो सद्गुरू सांवरियो, sadhak पर जादू कर ग्यो।
जादू करग्यो भाया, जादू कर ग्यो।
मारो सद्गुरू सांवरियो, sadhak पर जादू कर ग्यो।

दरशन दिदा हिवड़ा माही, जीवन दीयो अनमोल।
अरे बढ़ा ग्यों रे जोगी म्हारो, हरि सूं मेलजोल।।
मौत को यमराज्यों, मारा सूं डर ग्यो।
मारो सद्गुरू सांवरियो, sadhak पर जादू कर ग्यो।

ना छावें उठे थैला पाटी, ना पढ़ाई जोर।
ज्ञान की खाउं रोटी बाटी, दी चरणां म ठौर।।
भजना को भण्ड़ारों, मारा उर म भर ग्यो।
मारो सद्गुरू सांवरियो, sadhak पर जादू कर ग्यो।

ढोलक ताल मंजिरा बाजे, करे हरि की खोज।
अरे मिल गयो, परमेश्र मारो, अब रही है मौज।।
भव को सागर्यों, sadhak अब तर् ग्यो।
मारो सद्गुरू सांवरियो, sadhak पर जादू कर ग्यो।
जादू करग्यो भाया, जादू कर ग्यो।
 - sadhak

   
कुछ भी अच्छा नहीं लगता अब तेरे सिवा अगर मैं पसन्द करूं तो किसको ? जग को जो कि झूठा है, मान को, बड़ाई को अरें क्या फर्क  पड़ जायेगा मेरे को। जग की सारी बड़ाई मिल जाये, कोई फर्क नहीं पड़ता। दास हॅू तो भी उसका, बेटा हूॅ तो भी उसका अब संसार मुझे सम्पत समझे तो इसमें मेरा क्या कसूर!
    मैं तो मैंनेजर हॅू, भाड़ में जाये नौकरी मुझे तो मेरे मौला ने मैंनेजर बना दिया सम्पत रूपी देह का बस तत्परता व सयंम से मुझे इस सम्पत के शरीर के साथ बरताव करना हैं। नियम जो भी है निभाने है, कितना भी बेरोजगार कोई क्यों न हो लेकिन सम्पत ने तो रोजगार पा लिया हैं। अपने देह को साधन बनाकर साध्य को साधने का।
    मेरे गुरूदेव फरमाते है कि sadhak आज तक जो भी देखा वो सब माया था माया है। जहां भी चमक थी वहां धोखा था धोखा है। हर भोग में ग्लानि थी ग्लानि है। हर संयोग मे वियोग था हर मधुर संबंध में बिखराव था, तो तू क्यों लफडे में पड़ता हैं। आज तक बहुत दुःख आये सच तो यह है कि वे दुःख नहीं थें। फिर भी अगर आये तो तू जानने वाला था, जानने वाला है। वे चले गये अब नही हैं। तो भी तू जानने वाला हैं। तो तू क्यों अपने आप को सम्पत समझ रहा हैं। अरे! पगले जिसने तेरा नाम रखा उसका नाम भी तो किसी ने रखा । अब बात ये पक्की हो गई कि नाम, नाम खुद एक नाम हैं। बस तेरा तो एक ही काम हैं। लगी लगन को लगने दे . . . . .जिन्होने लगायी लगन ऐसे मेरे परम पूज्य गुरूदेव को कोटि-कोटि बार बार प्रणाम हैं।





                            - सम्पत शर्मा
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